Archive for February, 2012

अमृत कण

मनुष्य जीवन का समय बहुत मूल्यवान है. ये बार बार नहीं मिल सकता, इसलिए इसका सदुपयोग करना चाहिए. मृत्यु किसी को सूचना देकर नहीं आती, अचानक ही आ जाती है. यदि भगवान के स्मरण के बिना अगर मृत्यु आ जाए तो जीवन व्यर्थ ही गया. मृत्यु कब आ जाये, इसका कोई भरोसा नहीं, अतः भगवान के स्मरण का काम कभी भूलना नहीं चाहिए. मनुष्य को विचार करना चाहिए की मैं कौन हूँ, क्या कर रहा हूँ. और किस काम में मुझे समय बिताना चाहिए. बुद्धि से विचार कर वास्तव में जिसमे अपना परम हित हो, वही काम करना चाहिए.

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चरित्र का निर्माण

यदि तुम अपनी गलतियों के नाम पर, घर जा कर सिर पर हाथ रख रोते रहोगे तो तुम्हारा उद्धार नहीं हो सकता. बल्कि उससे तुम और भी दुर्बल हो जाओगे. यदि कोई कमरा हज़ारों वर्षों से अंधकारपूर्ण हो और तुम उसमे जा कर रोने धोने लगो – हाय! बड़ा अन्धेरा है, तो क्या उसमे से अँधेरा चला जाएगा? सारे जीवन यदि तुम अफ़सोस करते रहो. अरे! मैंने अनेक दुष्कर्म किये, बहुत सी गलतियां की तो उससे क्या लाभ? हम में बहुत से दोष हैं – ये किसी को बतलाना नहीं पड़ता. दोष, दुर्गुण दूर करने का दृढ़ता से उपाए करो, ज्ञान अग्नि प्रज्वलित करो, एक क्षण में सब अशुभ चला जाएगा. अपने चरित्र का निर्माण करो और अपने प्राकृत स्वरूप को – उसी ज्योतिर्मय, उज्ज्वल, नित्यशुद्ध स्वरूप को प्रकाशित करो, तथा प्रत्येक व्यक्ति में उसी आत्मा को जगाओ.

विषयों में दुर्गन्ध

कोई भक्त राजा एक महात्मा के पर्णकुटी पर जाया करते थे. उन्होंने एक बार महात्मा को अपने महलों में पधारने के लिए कहा, पर महात्मा में यह कह कर टाल दिया कि,”तुम्हारे महल में बहुत दुर्गन्ध आती है इसलिए मैं नहीं जाता.”

राजा को बड़ा अचरज हुआ, उन्होंने मन ही मन सोचा – ‘महल में तो इत्र छिड़का रहता है, वहां दुर्गन्ध का क्या काम! महात्मा जी कैसे कहते हैं, पता नहीं.’
राजा ने फिर संकोच से फिर कुछ नहीं कहा.

एक दिन महात्मा जी राजा को साथ लेकर निकले, घुमते घुमते चमारों की बस्ती में पहुँच गए. और वहां पीपल वृक्ष की छाया में खड़े हो गए. चमारों के घर में कहीं चमड़ा कमाया जा रहा था, कहीं सूख रहा था तो कहीं ताजा चमड़ा तैयार किया जा रहा था. हर घर में चमड़ा था और उसमे से बड़ी दुर्गन्ध आ रही थी. हवा भी इधर की ही थी, दुर्गन्ध के मारे राजा की नाक फटने लगी, उन्होंने महात्मा जी से कहा, “भगवन! दुर्गन्ध के मारे खड़ा नहीं रहा जाता – जल्दी चाहिए”.

महात्मा जी बोले – “तुम्हीं को दुर्गंध आती है? देखो चमारों के घर की ओर – कितने पुरुष, स्त्रियाँ और बाल बच्चे हैं, कोई काम कर रहे हैं कोई खा पी रहे हैं, सब हँस खेल रहे हैं. किसी को तो दुर्गन्ध नहीं आती, फिर तुम्ही को क्यों आने लगी?”

राजा ने कहा – “भगवन! चमड़ा कमाते कमाते तथा चमड़े में रहते रहते इनका अभ्यास हो गया है. इनकी नाक ही ऐसी हो गयी है कि इन्हें चमड़े की दुर्गन्ध नहीं आती. पर मैं तो इसका अभ्यासी नहीं हू. जल्दी चाहिए – अब तो एक क्षण भी यहाँ नहीं ठहरा जाता.”

महात्मा ने हँस कर कहा – “भई! यही हाल तुम्हारे राज महल का ही है. विषय – भोगों में रहते रहते तुम्हे उनमे दुर्गन्ध नहीं आती. तुम्हारा अभ्यास हो गया है.
पर मुझको तो विषय देखते ही उल्टी सी आती है, इसी से मैं तुम्हारे घर नहीं आता था.

राजा ने रहस्य समझ लिया, महात्मा हँस कर राजा को साथ लेकर वहां से चल दिए.

शिक्षा का महत्व

महाराज एक गाँव में सवा सौ मन गुड़ बाँट रहे थे.
एक बालिका को गुड़ देने लगे तो उसने इनकार करते हुए कहा, “मैं नहीं लूंगी.”
महाराज ने पुछा, “क्यूँ? “

“मुझे शिक्षा मिली है कि यूँ मुफ्त कुछ नहीं लेना चाहिए”, बालिका ने उत्तर दिया.
“तो कैसे लेना चाहिए?”
“ईश्वर ने दो हाथ तथा पैर दिए हैं और उनके बीच में पेट दिया है, इसलिए मुफ्त कुछ नहीं लेना चाहिए. जो मजदूरी से मिले वही लेना चाहिए.”

महाराज को आश्चर्य हुआ. इसे ऐसी शिक्षा देने वाला कौन है? यह जानने के लिए उन्होंने पूछा,”तुझे यह सीख किसने दी?”
“मेरी माँ ने.”

महाराज उसकी माँ के पास गए और पूछा, “तुमने लड़की को ये सीख कैसे दी?”

“क्यूँ महाराज, मैंने इसमें नया क्या कहा? भगवान ने जब हाथ पैर दिए हैं तो मुफ्त नहीं लेना चाहिए”.

“तुमने धर्म शास्त्र पढ़े हैं?”

“नहीं.”
“तुम्हारी आजीविका किस प्रकार चलती है?”
“भगवान सिर पर बैठा है, लकड़ी काट लाती हूँ, उससे अनाज मिल जाता है, लड़की भोजन बना लेती है, मजदूरी से हमारा गुज़ारा सुख संतोष के साथ निभ रहा है.”
“तो इस लड़की के पिता जी….?”
बहन उदास हो गयी और कुछ देर ठहर कर बोली, “लड़की के पिता थोड़ी आयु लेकर आये थे. हमें अकेला छोड़ कर चले गए. अपने पीछे तीस बीघे ज़मीन और दो बैल छोड़ गए थे. मैंने विचार किया कि इस संपत्ति में मेरा क्या लेना-देना है. मैंने इसके लिए कब पसीना बहाया. यदि मैं वृद्ध, अपंग या अशक्त होती तो अपने लिए इस संपत्ति का उपयोग करती, परन्तु ऐसा नहीं है. मेरे मन में आया कि मैं इस संपत्ति का क्या करूँ? भगवत कृपा से मुझे विचार आया कि यदि ये संपत्ति गाँव के किसी भलाई के कार्ये में लगा दी जाए तो बहुत अच्छा होगा. मैं सोचने लगी कि ऐसा कौनसा कार्य हो सकता है? हमारे गाँव में जल का बहुत कष्ट है, इसलिए कुआँ बनवा दूँ. मैंने ज़मीन बेच दी और उससे मिली सब रकम एक सेठ को सौंप कर उससे कहा कि इन पैसों से कुआँ बनवा दें. सेठ भले आदमी थे उन्होंने परिश्रम करके उस कुएँ के साथ ही पशुओं के जल पीने के लिए हौज भी बनवा दी.”

इस प्रकार उस स्त्री ने पति का संपत्ति का हक छोड़ कर उसका सद्व्यय किया.

“त्याग, न्याय, परोपकार की समझ तथा संस्कार से बढ़ कर और कौनसी शिक्षा हो सकती है. जो मैं अपनी पुत्री को देती.”

Values through Self-Exploration

  • Human desires and plan of action to fulfill them.
  •  The main focus – “Myself” – human aspirations and endeavor
  • Need to know who we are as both Personality and Soul.
  • Insights into ‘Who am I’ give us joy.
  • Mirror and the Identity: Knowing yourself is wisdom.
  • No definite answers to ‘Who am I ?’, so be at ease with everyone
  • Self-understanding gives us a sense of fulfilment.

Seek your identity through the relationships you form. Reach beyond and above Self and Encounter the Unknowable. Cherish larger-than-life thoughts. “What can we gain by sailing to the moon if we are not able to cross the abyss that separates us from ourselves? To realize our inherent happiness , we should know ourselves. Do not give up your Hold on the Self. You are your own raw material: Invent Yourself.

सह-अस्तित्व

सह-अस्तित्व में चार अवस्था

पदार्थ-अवस्था,

प्राण-अवस्था,

जीव-अवस्था,

और ज्ञान-अवस्था।

परिणाम-अनुषंगी विधि से सब पदार्थों का आचरण निश्चित और व्यवस्थित है। पत्थर , लोहा, मिटटी, मणि – इनका आचरण निश्चित है। इन चार वर्गों में पदार्थ-अवस्था को पूरा देखा जा सकता है। परिणाम के अनुसार आचरण करता हुआ पदार्थ-अवस्था “निर्दोष” है।

वनस्पति-संसार में अनेक प्रजातियाँ होती हैं। उनका आचरण निश्चित है। आम का आचरण निश्चित है। बेल का आचरण निश्चित है। धतूरे का आचरण निश्चित है। कोई ऐसा वनस्पति नहीं है – जिसके आचरण में स्खलन हो, सविप्रीत हो, वाद-विवाद हो, अव्यवस्था हो। ऐसा कुछ नहीं है – सबका आचरण निश्चित है। बीज-अनुशंगियता विधि से आचरण करता हुआ प्राण-अवस्था “निर्दोष” है।

उसी प्रकार जीवों में भी सभी आचरण निश्चित हैं। जीव-संसार वंश के अनुसार आचरण करता हुआ “निर्दोष” है।

मनुष्य में अभी आचरण निश्चित होना शेष है। सह-अस्तित्व सहज समझदारी पूर्वक ही मनुष्य का आचरण निश्चित हो सकता है।

विद्यार्थी और निष्ठा

विद्यार्थी निष्ठा से सुखी होते हैं.

विद्यार्थी निष्ठा से सुखी होते हैं।

विद्या को पाने का निष्ठा यदि बना रहता है तो विद्यार्थी सुखी रहता है।

निष्ठा जब टूट जाती है तो दुखी रहता है, इधर-उधर झांकता है।

विद्या का मतलब है – ज्ञान, विवेक, विज्ञानं से संपन्न होना। ज्ञान, विज्ञानं, विवेक संपन्न होने के लिए जो उपक्रम है, उसमें सदा-सदा अपना ध्यान लगा रहता है – इसका नाम है “निष्ठा”।

यदि अपना ध्यान लगना बंद हो जाता है, या ध्यान उचट जाता है – उसका मतलब निष्ठा नहीं है।

निष्ठा नहीं होने से मानव का विद्या से संपन्न होना या ज्ञान-विवेक-विज्ञानं संपन्न होना सम्भव नहीं है।

समझने के लिए निष्ठा चाहिए, हमारा मन लगना चाहिए, हमको इसमें तुलना चाहिए।

विद्या से संपन्न होने की अपेक्षा को बनाए रखना चाहिए।

विद्या से संपन्न होने के बीच में कोई रोड़ा नहीं लाना चाहिए। बीच में रोड़ा हो तो समझना बनता नहीं है। इतना ही निष्ठा का मतलब है।

निष्ठा पूर्वक हम समझने लगते हैं। निष्ठा पूर्वक समझना सुगम हो जाता है। निष्ठा नहीं होने से दुर्गम है ही – यह तो स्वाभाविक है।

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