Archive for March, 2012

आत्मविश्वास

सच्ची शान्ति, सच्चे सुख और सच्ची सफलता का पूर्ण रहस्य इश्वर-विश्वास या आत्मविश्वास है । जब तुम्हें यह विश्वास हो जाएगा की सुख, शान्ति और सफलता बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती, वे तुम्हारे आभ्यांतरिक विश्वास पर ही निर्भर हैं, तब तुममें उस विलक्षण शक्ति का उदय हो जाएगा, जो बाहरी परिस्थितियों को बदल देगी और सुख, शान्ति और सफलता सहज ही तुम्हें प्राप्त हो जाएगी ।

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संतोष

संतोष, आलसी और अकर्मण्य पुरुषोंके कामकी वस्तु नहीं है । आलसी और अकर्मण्य पुरुष संतोषी नहीं होते; वे तो कामना की ज्वाला में सदा जलते रहते हैं । उनकी तृष्णा कभी नहीं मिटती । कुशलतापूर्वक कर्म करने की शक्ति और मति न होने के कारण वे संतोष का नाम ले लेते हैं । उनका वह संतोष वस्तुतः आध्यात्मिक पथ के परम साधनरूप ‘संतोष’ से सर्वथा भिन्न एक तामसिक भावमात्र है । संतोष तो मनुष्यको विषयासक्ति से छुडाकर, तृष्णा के तपते हुए प्रवाहसे पृथक करके इश्वराभिमुखी बनाकर सच्चा कर्तव्यशील बना देता है । शांतचित संतोषी पुरुष ही अपने सारे व्यक्तिगत स्वार्थोंको छोड़कर निष्कामभाव से देश और विश्वके कल्याण के लिए सम्यक रूपसे यथायोग्य कर्तव्य-कर्मका आचरण कर सकता है ।

नौलखा हार

एक राज कन्या अपनी सखियों के साथ जल क्रीडा के लिए गयी. सरोवर के किनारे राज कन्या ने अपना अनमोल गले का हार उतार कर रख दिया. सभी स्नान का सुख लेकर जल से बाहर निकल अपने अपने कपडे पहनने लगे. राज कन्या का नौलखा हार नहीं मिल रहा.  किसी सखी की शरारत नहीं क्योंकि सभी सरोवर के भीतर थी. इधर उधर खोजने पर भी हार ना मिला. महल पहुँच कर राजा को सुचना दी गयी, नगर में घोषणा हुई जो ढूंढ कर लौटाएगा, उसे एक लाख रुपये इनाम मिलेगा. खोज शुरू हुई, लेकिन सभी असफल हुए. एक लकड़हारा प्यास से व्याकुल हो पानी पीने के लिए उसी सरोवर के किनारे गया. पानी पीते पीते उसे हार तल पर पड़ा दिखाई दिया. उसकी प्रसन्नता की सीमा ना रही, डुबकी लगाई हार पकड़ने की कोशिश की लेकिन हाथ में हार नहीं कीचड आता. बाहर निकला, जल निश्चल हुआ पुनः हार दिखा, डुबकी लगाई फिर हाथ में पंक. जाकर राजा को सूचना दी, विशेषज्ञ बुलवाए गए. उनके भी सभी प्रयास विफल हुए. सभी चकित एवं निराश.
एक संत का आगमन हुआ. भीड़ का कारण पूछा. समस्या सुनी – कुशाग्र बुद्धि थे, अविलम्ब समझ गए. हार ऊपर पेड़ पर लटक रहा था. जिसे पंची उठा कर अपने घोंसले में ले गया था. उसी का प्रतिबिम्ब जल में दिखाई दे रहा था. छाया को कैसे पकड़ा जाए. अतः सब के हाथ में कीचड.

हम चाहते तो बिम्ब हैं – परम सुख और पकड़ रहे हैं प्रतिबिम्ब को – नश्वर सुख को. तो हाथ में कीचड ही आता है. अर्थात् दुःख या दुःख युक्त सुख ही जीवन भर मिलता है. हमारी खोज ही त्रुटिपूर्ण है. उस सुख को पाने के लिए यात्रा शुरू करो. सदा स्मरणीय तथ्य याद रखें – प्रतिबिम्ब से वास्तु प्राप्त नहीं होती अतः बिम्ब को पकड़ो अर्थात् उसे पकड़ो जहाँ सुख निवास करता है. विषय सुख या संसारी सुख उस परमानन्द परमसुख की परछाई है. अतएव संसार से कभी सुख नहीं मिलेगा. शान्ति, सुख और आनंद रूपी हीरों का हार जिसे हम संसार में प्रतिबिम्ब की तरह पाने की कोशिश कर रहे हैं और निराश होते हैं. कीचड अर्थात् दुःख बार बार हाथ लगता है. उस सुख शान्ति आनंद का स्त्रोत है परमात्मा अर्थात् बिम्ब. इसी की प्राप्ति है प्रत्येक के जीवन का लक्ष्य.

आदर्श जीवनचर्या

हमारे शरीर में मुख्य रूप से बारह अंग होते हैं| प्राण ऊर्जा चौबीस घंटों में सभी अंगों में जाती है| हर अंग में दो घंटे अधिकतम ऊर्जा का प्रवाह रहता है| इसके ठीक विपिरीत समय में ऊसी अंग में न्यूनतम ऊर्जा का प्रवाह रहता है|

प्रातः तीन से पांच
– फेफड़े
– इसी कारण ब्राह्म्मुहूर्त में ऊठ कर खुली हवा में घूमना चाहिए| प्राणायाम श्वसन से फेफड़े स्वस्थ होते हैं, फेफडो को ऑक्सीजन प्राप्त होती है| इसके रक्त में मिलने से हिमोग्लोबिन आक्सीकृत होता है| जिससे शरीर स्वस्थ ओर स्फूर्तिवान बनेगा|

प्रातः पांच से सात
– बड़ी आँत
– इसी कारण मल त्याग के लिए यह सर्वोत्तम समय है| जो व्यक्ति इस समय सोते रहते हैं, मल त्याग नहीं करते, ऊनका पेट खराब रहता है और कब्ज रहता है| इस समय ऊठ कर योग आसान तथा व्यायाम करना चाहिए|

प्रातः सात से नौ
– अमाशय
– इस समय तक बड़ी आँत की सफाई हो जाने से पाचन आसानी से होता है| अतः इस समय भोजन करना चाहिए| प्रातः भोज करने से पाचन अच्छी तरह से होता है| और हम सैकड़ों पाचन सम्बन्धी रोगों से सहज ही बचे रहते हैं|

प्रातः नौ से ग्यारह
– तिल्ली( स्प्लीन) और पैन्क्रियाज
– इस समय हमारे शरीर में पैंक्रियाटिक रस तथा इंसुलिन सबसे ज्यादा बनता है| इन रसों का पाचन में विशेष महत्व है| अतः जो डायबिटीज़ या किसी पाचन रोग से ग्रस्त हैं, ऊन्हें इस समय तक भोजन अवश्य कर लेना चाहिए|

ग्यारह से एक
– हृदय
– हमारी संवेदनाओं, करुणा, दया तथा प्रेम का प्रतीक है| अतः इस समय भोजन करते हैं तो अधिकतर संवेदनाएं भोजन के स्वाद की तरफ आकर्षित होती हैं| हृदय प्रकृति से मिलने वाली अपनी प्राण ऊर्जा पूर्ण रूप से ग्रहण नहीं कर पता|
एक बजे तक भोजन करने से रक्त परिसंचरण अच्छा होता है| और हम अपने आप को ऊर्जान्वित महसूस करते हैं|

दोपहर एक से तीन
– छोटी आँत
– छोटी आँत का मुख्य कार्ये पोषक तत्वों का शोषण करना था अवशिष्ट पदार्थ को आगे बड़ी आँत में भेजना है| जहाँ तक हो सके इस समय भोजन नहीं करना चाहिए|
इस समय भोजन करने से छोटी आँत अपनी पूरी क्षमता से कार्ये नहीं कर पाती| इसी कारण आज कर मानव में संवेदना, करुणा, दया अपेक्षाकृत कम होती जा रही है|

दोपहर  तीन से पांच
– मूत्राशय (यूरिनरी ब्लेडर)
– इस अंग का मुख्य कार्य जल तथा द्रव पदार्थों का नियंत्रण करना है|

सायंकाल पांच से सात
– किडनी
– इस समय शाम का भोजन कर लेना चाहिए| इसमें हम किडनी और कान से सम्बंधित रोगों से बचे रहेंगे|

रात्रि सात से नौ
– मस्तिष्क
– इस समय विद्यार्थी पाठ याद करें तो ऊन्हें अपना पाठ जल्दी याद होगा|

रात्रि नौ से ग्यारह
– स्पाइनल कॉर्ड
– इस समय हमें सो जाना चाहिए| जिस से हमारे स्पाइन को पूरा आराम मिले|

रात्रि ग्यारह से एक
– गाल्ब्लेडर
– इसका मुख्य कार्ये पित्त का संचय एवं मानसिक गतिविधियों पर नियंत्रण करना है| यदि इस समय जागते हैं तो नेत्र और पित्त सम्बंधित रोग होते हैं|

रात्रि एक से तीन
– लीवर
– लीवर हमारे शरीर का मुख्य अंग है| यदि आप इस समय तक जागते हैं तो पित्त सम्बन्धी विकार होता है| नेत्रों पर बुरा प्रभाव, स्वभाव चिडचिडा तथा व्यक्ति जिद्दी हो जाता है| यदि किसी कारण देर रात तक जागना पड़े तो हर एक घंटे बाद एक गिलास पानी पीते रहना चाहिए|

लीवर से प्राण ऊर्जा वापिस फेफड़ों में चली जाती है|

हमारे जीवन का पहला सुख है निरोगी काया| इसके अभाव में हमारी सारी भाग दौड़ सुखी ना बना सकेगी|

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