नौलखा हार

एक राज कन्या अपनी सखियों के साथ जल क्रीडा के लिए गयी. सरोवर के किनारे राज कन्या ने अपना अनमोल गले का हार उतार कर रख दिया. सभी स्नान का सुख लेकर जल से बाहर निकल अपने अपने कपडे पहनने लगे. राज कन्या का नौलखा हार नहीं मिल रहा.  किसी सखी की शरारत नहीं क्योंकि सभी सरोवर के भीतर थी. इधर उधर खोजने पर भी हार ना मिला. महल पहुँच कर राजा को सुचना दी गयी, नगर में घोषणा हुई जो ढूंढ कर लौटाएगा, उसे एक लाख रुपये इनाम मिलेगा. खोज शुरू हुई, लेकिन सभी असफल हुए. एक लकड़हारा प्यास से व्याकुल हो पानी पीने के लिए उसी सरोवर के किनारे गया. पानी पीते पीते उसे हार तल पर पड़ा दिखाई दिया. उसकी प्रसन्नता की सीमा ना रही, डुबकी लगाई हार पकड़ने की कोशिश की लेकिन हाथ में हार नहीं कीचड आता. बाहर निकला, जल निश्चल हुआ पुनः हार दिखा, डुबकी लगाई फिर हाथ में पंक. जाकर राजा को सूचना दी, विशेषज्ञ बुलवाए गए. उनके भी सभी प्रयास विफल हुए. सभी चकित एवं निराश.
एक संत का आगमन हुआ. भीड़ का कारण पूछा. समस्या सुनी – कुशाग्र बुद्धि थे, अविलम्ब समझ गए. हार ऊपर पेड़ पर लटक रहा था. जिसे पंची उठा कर अपने घोंसले में ले गया था. उसी का प्रतिबिम्ब जल में दिखाई दे रहा था. छाया को कैसे पकड़ा जाए. अतः सब के हाथ में कीचड.

हम चाहते तो बिम्ब हैं – परम सुख और पकड़ रहे हैं प्रतिबिम्ब को – नश्वर सुख को. तो हाथ में कीचड ही आता है. अर्थात् दुःख या दुःख युक्त सुख ही जीवन भर मिलता है. हमारी खोज ही त्रुटिपूर्ण है. उस सुख को पाने के लिए यात्रा शुरू करो. सदा स्मरणीय तथ्य याद रखें – प्रतिबिम्ब से वास्तु प्राप्त नहीं होती अतः बिम्ब को पकड़ो अर्थात् उसे पकड़ो जहाँ सुख निवास करता है. विषय सुख या संसारी सुख उस परमानन्द परमसुख की परछाई है. अतएव संसार से कभी सुख नहीं मिलेगा. शान्ति, सुख और आनंद रूपी हीरों का हार जिसे हम संसार में प्रतिबिम्ब की तरह पाने की कोशिश कर रहे हैं और निराश होते हैं. कीचड अर्थात् दुःख बार बार हाथ लगता है. उस सुख शान्ति आनंद का स्त्रोत है परमात्मा अर्थात् बिम्ब. इसी की प्राप्ति है प्रत्येक के जीवन का लक्ष्य.

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