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आत्मविश्वास

सच्ची शान्ति, सच्चे सुख और सच्ची सफलता का पूर्ण रहस्य इश्वर-विश्वास या आत्मविश्वास है । जब तुम्हें यह विश्वास हो जाएगा की सुख, शान्ति और सफलता बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती, वे तुम्हारे आभ्यांतरिक विश्वास पर ही निर्भर हैं, तब तुममें उस विलक्षण शक्ति का उदय हो जाएगा, जो बाहरी परिस्थितियों को बदल देगी और सुख, शान्ति और सफलता सहज ही तुम्हें प्राप्त हो जाएगी ।

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संतोष

संतोष, आलसी और अकर्मण्य पुरुषोंके कामकी वस्तु नहीं है । आलसी और अकर्मण्य पुरुष संतोषी नहीं होते; वे तो कामना की ज्वाला में सदा जलते रहते हैं । उनकी तृष्णा कभी नहीं मिटती । कुशलतापूर्वक कर्म करने की शक्ति और मति न होने के कारण वे संतोष का नाम ले लेते हैं । उनका वह संतोष वस्तुतः आध्यात्मिक पथ के परम साधनरूप ‘संतोष’ से सर्वथा भिन्न एक तामसिक भावमात्र है । संतोष तो मनुष्यको विषयासक्ति से छुडाकर, तृष्णा के तपते हुए प्रवाहसे पृथक करके इश्वराभिमुखी बनाकर सच्चा कर्तव्यशील बना देता है । शांतचित संतोषी पुरुष ही अपने सारे व्यक्तिगत स्वार्थोंको छोड़कर निष्कामभाव से देश और विश्वके कल्याण के लिए सम्यक रूपसे यथायोग्य कर्तव्य-कर्मका आचरण कर सकता है ।

आदर्श जीवनचर्या

हमारे शरीर में मुख्य रूप से बारह अंग होते हैं| प्राण ऊर्जा चौबीस घंटों में सभी अंगों में जाती है| हर अंग में दो घंटे अधिकतम ऊर्जा का प्रवाह रहता है| इसके ठीक विपिरीत समय में ऊसी अंग में न्यूनतम ऊर्जा का प्रवाह रहता है|

प्रातः तीन से पांच
– फेफड़े
– इसी कारण ब्राह्म्मुहूर्त में ऊठ कर खुली हवा में घूमना चाहिए| प्राणायाम श्वसन से फेफड़े स्वस्थ होते हैं, फेफडो को ऑक्सीजन प्राप्त होती है| इसके रक्त में मिलने से हिमोग्लोबिन आक्सीकृत होता है| जिससे शरीर स्वस्थ ओर स्फूर्तिवान बनेगा|

प्रातः पांच से सात
– बड़ी आँत
– इसी कारण मल त्याग के लिए यह सर्वोत्तम समय है| जो व्यक्ति इस समय सोते रहते हैं, मल त्याग नहीं करते, ऊनका पेट खराब रहता है और कब्ज रहता है| इस समय ऊठ कर योग आसान तथा व्यायाम करना चाहिए|

प्रातः सात से नौ
– अमाशय
– इस समय तक बड़ी आँत की सफाई हो जाने से पाचन आसानी से होता है| अतः इस समय भोजन करना चाहिए| प्रातः भोज करने से पाचन अच्छी तरह से होता है| और हम सैकड़ों पाचन सम्बन्धी रोगों से सहज ही बचे रहते हैं|

प्रातः नौ से ग्यारह
– तिल्ली( स्प्लीन) और पैन्क्रियाज
– इस समय हमारे शरीर में पैंक्रियाटिक रस तथा इंसुलिन सबसे ज्यादा बनता है| इन रसों का पाचन में विशेष महत्व है| अतः जो डायबिटीज़ या किसी पाचन रोग से ग्रस्त हैं, ऊन्हें इस समय तक भोजन अवश्य कर लेना चाहिए|

ग्यारह से एक
– हृदय
– हमारी संवेदनाओं, करुणा, दया तथा प्रेम का प्रतीक है| अतः इस समय भोजन करते हैं तो अधिकतर संवेदनाएं भोजन के स्वाद की तरफ आकर्षित होती हैं| हृदय प्रकृति से मिलने वाली अपनी प्राण ऊर्जा पूर्ण रूप से ग्रहण नहीं कर पता|
एक बजे तक भोजन करने से रक्त परिसंचरण अच्छा होता है| और हम अपने आप को ऊर्जान्वित महसूस करते हैं|

दोपहर एक से तीन
– छोटी आँत
– छोटी आँत का मुख्य कार्ये पोषक तत्वों का शोषण करना था अवशिष्ट पदार्थ को आगे बड़ी आँत में भेजना है| जहाँ तक हो सके इस समय भोजन नहीं करना चाहिए|
इस समय भोजन करने से छोटी आँत अपनी पूरी क्षमता से कार्ये नहीं कर पाती| इसी कारण आज कर मानव में संवेदना, करुणा, दया अपेक्षाकृत कम होती जा रही है|

दोपहर  तीन से पांच
– मूत्राशय (यूरिनरी ब्लेडर)
– इस अंग का मुख्य कार्य जल तथा द्रव पदार्थों का नियंत्रण करना है|

सायंकाल पांच से सात
– किडनी
– इस समय शाम का भोजन कर लेना चाहिए| इसमें हम किडनी और कान से सम्बंधित रोगों से बचे रहेंगे|

रात्रि सात से नौ
– मस्तिष्क
– इस समय विद्यार्थी पाठ याद करें तो ऊन्हें अपना पाठ जल्दी याद होगा|

रात्रि नौ से ग्यारह
– स्पाइनल कॉर्ड
– इस समय हमें सो जाना चाहिए| जिस से हमारे स्पाइन को पूरा आराम मिले|

रात्रि ग्यारह से एक
– गाल्ब्लेडर
– इसका मुख्य कार्ये पित्त का संचय एवं मानसिक गतिविधियों पर नियंत्रण करना है| यदि इस समय जागते हैं तो नेत्र और पित्त सम्बंधित रोग होते हैं|

रात्रि एक से तीन
– लीवर
– लीवर हमारे शरीर का मुख्य अंग है| यदि आप इस समय तक जागते हैं तो पित्त सम्बन्धी विकार होता है| नेत्रों पर बुरा प्रभाव, स्वभाव चिडचिडा तथा व्यक्ति जिद्दी हो जाता है| यदि किसी कारण देर रात तक जागना पड़े तो हर एक घंटे बाद एक गिलास पानी पीते रहना चाहिए|

लीवर से प्राण ऊर्जा वापिस फेफड़ों में चली जाती है|

हमारे जीवन का पहला सुख है निरोगी काया| इसके अभाव में हमारी सारी भाग दौड़ सुखी ना बना सकेगी|

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अमृत कण

मनुष्य जीवन का समय बहुत मूल्यवान है. ये बार बार नहीं मिल सकता, इसलिए इसका सदुपयोग करना चाहिए. मृत्यु किसी को सूचना देकर नहीं आती, अचानक ही आ जाती है. यदि भगवान के स्मरण के बिना अगर मृत्यु आ जाए तो जीवन व्यर्थ ही गया. मृत्यु कब आ जाये, इसका कोई भरोसा नहीं, अतः भगवान के स्मरण का काम कभी भूलना नहीं चाहिए. मनुष्य को विचार करना चाहिए की मैं कौन हूँ, क्या कर रहा हूँ. और किस काम में मुझे समय बिताना चाहिए. बुद्धि से विचार कर वास्तव में जिसमे अपना परम हित हो, वही काम करना चाहिए.

चरित्र का निर्माण

यदि तुम अपनी गलतियों के नाम पर, घर जा कर सिर पर हाथ रख रोते रहोगे तो तुम्हारा उद्धार नहीं हो सकता. बल्कि उससे तुम और भी दुर्बल हो जाओगे. यदि कोई कमरा हज़ारों वर्षों से अंधकारपूर्ण हो और तुम उसमे जा कर रोने धोने लगो – हाय! बड़ा अन्धेरा है, तो क्या उसमे से अँधेरा चला जाएगा? सारे जीवन यदि तुम अफ़सोस करते रहो. अरे! मैंने अनेक दुष्कर्म किये, बहुत सी गलतियां की तो उससे क्या लाभ? हम में बहुत से दोष हैं – ये किसी को बतलाना नहीं पड़ता. दोष, दुर्गुण दूर करने का दृढ़ता से उपाए करो, ज्ञान अग्नि प्रज्वलित करो, एक क्षण में सब अशुभ चला जाएगा. अपने चरित्र का निर्माण करो और अपने प्राकृत स्वरूप को – उसी ज्योतिर्मय, उज्ज्वल, नित्यशुद्ध स्वरूप को प्रकाशित करो, तथा प्रत्येक व्यक्ति में उसी आत्मा को जगाओ.

विषयों में दुर्गन्ध

कोई भक्त राजा एक महात्मा के पर्णकुटी पर जाया करते थे. उन्होंने एक बार महात्मा को अपने महलों में पधारने के लिए कहा, पर महात्मा में यह कह कर टाल दिया कि,”तुम्हारे महल में बहुत दुर्गन्ध आती है इसलिए मैं नहीं जाता.”

राजा को बड़ा अचरज हुआ, उन्होंने मन ही मन सोचा – ‘महल में तो इत्र छिड़का रहता है, वहां दुर्गन्ध का क्या काम! महात्मा जी कैसे कहते हैं, पता नहीं.’
राजा ने फिर संकोच से फिर कुछ नहीं कहा.

एक दिन महात्मा जी राजा को साथ लेकर निकले, घुमते घुमते चमारों की बस्ती में पहुँच गए. और वहां पीपल वृक्ष की छाया में खड़े हो गए. चमारों के घर में कहीं चमड़ा कमाया जा रहा था, कहीं सूख रहा था तो कहीं ताजा चमड़ा तैयार किया जा रहा था. हर घर में चमड़ा था और उसमे से बड़ी दुर्गन्ध आ रही थी. हवा भी इधर की ही थी, दुर्गन्ध के मारे राजा की नाक फटने लगी, उन्होंने महात्मा जी से कहा, “भगवन! दुर्गन्ध के मारे खड़ा नहीं रहा जाता – जल्दी चाहिए”.

महात्मा जी बोले – “तुम्हीं को दुर्गंध आती है? देखो चमारों के घर की ओर – कितने पुरुष, स्त्रियाँ और बाल बच्चे हैं, कोई काम कर रहे हैं कोई खा पी रहे हैं, सब हँस खेल रहे हैं. किसी को तो दुर्गन्ध नहीं आती, फिर तुम्ही को क्यों आने लगी?”

राजा ने कहा – “भगवन! चमड़ा कमाते कमाते तथा चमड़े में रहते रहते इनका अभ्यास हो गया है. इनकी नाक ही ऐसी हो गयी है कि इन्हें चमड़े की दुर्गन्ध नहीं आती. पर मैं तो इसका अभ्यासी नहीं हू. जल्दी चाहिए – अब तो एक क्षण भी यहाँ नहीं ठहरा जाता.”

महात्मा ने हँस कर कहा – “भई! यही हाल तुम्हारे राज महल का ही है. विषय – भोगों में रहते रहते तुम्हे उनमे दुर्गन्ध नहीं आती. तुम्हारा अभ्यास हो गया है.
पर मुझको तो विषय देखते ही उल्टी सी आती है, इसी से मैं तुम्हारे घर नहीं आता था.

राजा ने रहस्य समझ लिया, महात्मा हँस कर राजा को साथ लेकर वहां से चल दिए.

शिक्षा का महत्व

महाराज एक गाँव में सवा सौ मन गुड़ बाँट रहे थे.
एक बालिका को गुड़ देने लगे तो उसने इनकार करते हुए कहा, “मैं नहीं लूंगी.”
महाराज ने पुछा, “क्यूँ? “

“मुझे शिक्षा मिली है कि यूँ मुफ्त कुछ नहीं लेना चाहिए”, बालिका ने उत्तर दिया.
“तो कैसे लेना चाहिए?”
“ईश्वर ने दो हाथ तथा पैर दिए हैं और उनके बीच में पेट दिया है, इसलिए मुफ्त कुछ नहीं लेना चाहिए. जो मजदूरी से मिले वही लेना चाहिए.”

महाराज को आश्चर्य हुआ. इसे ऐसी शिक्षा देने वाला कौन है? यह जानने के लिए उन्होंने पूछा,”तुझे यह सीख किसने दी?”
“मेरी माँ ने.”

महाराज उसकी माँ के पास गए और पूछा, “तुमने लड़की को ये सीख कैसे दी?”

“क्यूँ महाराज, मैंने इसमें नया क्या कहा? भगवान ने जब हाथ पैर दिए हैं तो मुफ्त नहीं लेना चाहिए”.

“तुमने धर्म शास्त्र पढ़े हैं?”

“नहीं.”
“तुम्हारी आजीविका किस प्रकार चलती है?”
“भगवान सिर पर बैठा है, लकड़ी काट लाती हूँ, उससे अनाज मिल जाता है, लड़की भोजन बना लेती है, मजदूरी से हमारा गुज़ारा सुख संतोष के साथ निभ रहा है.”
“तो इस लड़की के पिता जी….?”
बहन उदास हो गयी और कुछ देर ठहर कर बोली, “लड़की के पिता थोड़ी आयु लेकर आये थे. हमें अकेला छोड़ कर चले गए. अपने पीछे तीस बीघे ज़मीन और दो बैल छोड़ गए थे. मैंने विचार किया कि इस संपत्ति में मेरा क्या लेना-देना है. मैंने इसके लिए कब पसीना बहाया. यदि मैं वृद्ध, अपंग या अशक्त होती तो अपने लिए इस संपत्ति का उपयोग करती, परन्तु ऐसा नहीं है. मेरे मन में आया कि मैं इस संपत्ति का क्या करूँ? भगवत कृपा से मुझे विचार आया कि यदि ये संपत्ति गाँव के किसी भलाई के कार्ये में लगा दी जाए तो बहुत अच्छा होगा. मैं सोचने लगी कि ऐसा कौनसा कार्य हो सकता है? हमारे गाँव में जल का बहुत कष्ट है, इसलिए कुआँ बनवा दूँ. मैंने ज़मीन बेच दी और उससे मिली सब रकम एक सेठ को सौंप कर उससे कहा कि इन पैसों से कुआँ बनवा दें. सेठ भले आदमी थे उन्होंने परिश्रम करके उस कुएँ के साथ ही पशुओं के जल पीने के लिए हौज भी बनवा दी.”

इस प्रकार उस स्त्री ने पति का संपत्ति का हक छोड़ कर उसका सद्व्यय किया.

“त्याग, न्याय, परोपकार की समझ तथा संस्कार से बढ़ कर और कौनसी शिक्षा हो सकती है. जो मैं अपनी पुत्री को देती.”

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